भारतीय सेक्सुअलिटी : लड़कियों की एज ऑफ कंसेंट
Written by मुकेश कुमार on Wednesday, March 12, 2008जब से लॉ कमिशन ने सरकार को लड़कियों की एज ऑफ कंसेंट (सहवास की सहमति देने लायक उम्र) पंद्रह से बढ़ाकर सोलह करने का सुझाव दिया है, भारतीय सेक्सुअलिटी के विविध आयामों पर पिछले पचास साल से चल रही बहस एक नई मंजिल पर पहुंच गई है। अगर सेक्स पर पड़े सारे रहस्यों का पर्दाफाश करते हुए उसके साथ जुड़ी रोमानी खामख्याली को नजरअंदाज कर दिया जाए, तो यह बात आईने की तरह साफ हो जाती है कि विवाह की संस्था के तहत अधिकतर स्त्रियां अपने पहले सहवास के साथी के रूप में एक अपरिचित पुरुष को स्वीकार करने को मजबूर होती हैं। हमारा समाज आम तौर पर अजनबियों के बीच होने वाली पहली यौन क्रिया के आधार पर ही चल रहा है। जाहिर है, सेक्स और स्त्नी के इस समीकरण में स्त्नी ही सबसे ज्यादा जोखिम का सामना करती है। इसलिए हमारे समाज के लिए खास तौर से जरूरी हो जाता है कि वह स्त्नी की एज ऑफ कंसेंट पर संजीदगी से गौर करे। पचास साल पहले बने कानून के आधार पर हमारा सामाजिक और पारिवारिक सफर काफी हो चुका। वह कानून उपयोगी था, लेकिन अब इन बातों पर नए फैसलों की जरूरत है। ऐसे फैसलों की, जो बदली हुई हकीकतों पर खरे उतर सकें।
आखिर ये बदली हुई हकीकतें क्या हैं? बदलते हुए यथार्थ का एक अहम पहलू यह है कि पिछले पच्चीस-तीस बरसों में भारतीय परिवार की संस्था की सदियों पुरानी जमीन खिसकने लगी है। सत्तर के दशक तक सेक्स का वैध केंद्र एक ही था- मध्यवर्गीय पति-पत्नी का शयनकक्ष। सेक्स का अवैध केंद्र था चकलाघर। यानी तब सेक्स के वैध और अवैध दायरे सुपरिभाषित होने के बावजूद संकीर्ण थे। आज परिवार की संस्था के भीतर हो रहे छोटे-छोटे सामाजिक धमाकों ने तलाक का प्रतिशत कई गुना कर दिया है, जिससे विवाह अब सात जन्मों का बंधन न रहकर इसी जन्म में निबट जाने वाला रिश्ता बन गया है। एक व्यक्ति के लिए (चाहे स्त्नी हो या पुरुष) कानूनी तौर पर मोनोगमी का पालन करते हुए एक के बाद एक कई रिश्तों की संभावनाएं खुल गई हैं। लिव-इन रिलेशनशिप उभर कर सामने आए हैं। इन परिघटनाओं ने परिवार की संस्था का दैवी आधार हिला दिया है। सेक्सुअलिटी के इतिहासकारों का यह कहना गलत नहीं है कि जैसे ही किसी समाज में परिवार की संस्था अस्थिर होती है, वैसे ही वहां पथभ्रष्ट समझी जाने वाली यौनिकताएं तेजी से अपनी दावेदारियों के साथ सामने आती हैं। उन समाजों में समलैंगिकताएं, आत्मरति के विभिन्न उपाय और यौन संतुष्टि का पूरा कारोबार सेक्सुअलिटी के स्थापित पारिवारिक रूपों को चुनौती देने लगता है।
खास बात यह है कि ये सारे बदलाव एक ऐसे समय में हो रहे हैं जिसमें विचारधाराओं के खंडहर चारों तरफ बिखरे हैं। चाहे वह राष्ट्रवाद हो, सेकुलरवाद हो, मार्क्सवाद हो या प्राचीन भारत की शान बधारने वाली परंपरा हो, ये सभी विचार पहले की तरह प्रामाणिकता के स्त्रोत नहीं रह गए हैं। जिंदगी को मायने देने वाली प्रामाणिकता की भरपाई करने के लिए जो शै उभर कर आई है, वह सेक्स है। बाजार ने इसमें जबरदस्त योगदान किया है। शॉपिंग और डेटिंग एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। ऐसे सेक्सी समय में अगर एज ऑफ कंसेंट गड़बड़ रही, तो समाज का कबाड़ा होना तय है।
लेकिन ऐसे विकट समय के लिए एज ऑफ कंसेंट तय करना इतना आसान भी नहीं। इसे बढ़ाने के तर्क जोरदार लगते हैं और घटाने की दलीलें भी। मसलन, उम्र घटाने के पैरोकार मानते हैं कि यह उम्र जितनी ज्यादा रखी जाएगी, यौन शिक्षा देने में उतनी ही दिक्कत आएगी। कमसिन युवक-युवतियों के लिए सेक्स एक्ट का अपराधीकरण उन्हें अपनी कामनाएं और उनसे जुड़े सवाल छिपाने की तरफ ले जाएगा। इससे एड्स और अन्य यौन बीमारियों के चंगुल में फंसने का खतरा बढ़ेगा। दूसरी तरफ उम्र बढ़ाने के पैरोकारों की मान्यता है कि हमारा समाज आधुनिक है, आदिम नहीं। यहां स्त्री प्रजनन के स्त्रोत के तौर पर नहीं देखी जा सकती। शारीरिक विकास से भी ज्यादा जरूरी है उसका मानसिक विकास होना। दूसरे, नई अर्थव्यवस्था में वह उत्पादक श्रम का बहुत बड़ा स्त्रोत है। अगर वह वयस्क और परिपक्व होने से पहले ही बच्चा जनने में फंस गई तो समाज अपनी आधी आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से की रचनात्मक प्रतिभा से वंचित रह सकता है। एक तीसरा तर्क भी है, जो विशुद्ध तकनीकी किस्म का है। इसका कहना है कि अन्य संबंधित कानूनों और एज ऑफ कंसेंट कानून के बीच मौजूदा विसंगतियों को खत्म करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। इसके अलावा कुछ लोगों को इस कानून की समीक्षा इसलिए भी जरूरी प्रतीत हो रही है कि इससे मनुष्य के बचपन की चौहद्दी नए सिरे से तय की जा सकती है। सहवास की सहमति देने लायक हो जाने पर व्यक्ति को तकनीकी रूप से बच्चा तो नहीं ही माना जा सकता। बाल यौन शोषण या बाल श्रम की परिभाषा भी इससे बदल जाएगी।
आजाद भारत में इस विषय पर बहस का पहला दौर पचास के दशक में चला था। तब देश के पहले कानून मंत्नी डॉ. आम्बेडकर ने हिंदू कोड बिल पेश किया था। उस समय हिंदू समाज की सभी अनुदारतावादी ताकतें एकजुट होकर एज ऑफ कंसेंट बिल के खिलाफ खड़ी हो गई थीं। चूंकि हिंदू समाज की आधुनिकता का भविष्य काफी कुछ इस कानून के पास होने पर निर्भर था, इसलिए हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने झुकने से इनकार करते हुए कानून बनाकर ही दम लिया। लेकिन आज लॉ कमिशन के इस सुझाव पर चल रही बहस का लहजा तल्ख होने के बजाय संतुलित और सकारात्मक है। दोनों बहसों के चरित्न का यह फर्क बताता है कि समाज कितना बदल चुका है। आज की चर्चा में न तो नैतिकता के ठेकेदारों की आवाज सुनाई पड़ रही है, और न ही धर्म व परंपरा की दुहाई दी जा रही है। विशेषज्ञों की भूमिका अधिक है। सेक्स और समाज का रिश्ता सेक्सुअलिटी की दुनियावी कसौटियों पर कसा जा रहा है। इसलिए हम उम्मीद कर सकते हैं कि एज ऑफ कंसेंट की दुविधा दूर करते हुए जो नया कानून बनेगा उसका सूत्नीकरण बिना किसी दबाव के सूझबूझ के साथ हमारे सामाजिक विकास के नए चरण के मुताबिक किया जाएगा।

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