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सच्चा दान

Written by मुकेश कुमार on Friday, November 02, 2007

बुद्ध ने मगध की राजधानी में उपदेश देने के बाद लौटने का निश्चय किया तो अनेक उपासक उन्हें भेंट देने आए। बुद्ध एक पेड़ के नीचे हर किसी का उपहार स्वीकार कर रहे थे। सम्राट बिम्बसार ने अनेक बहुमूल्य वस्तुएं प्रदान कीं। सेठ-साहूकार भी कीमती चीजें लेकर आए थे। बुद्ध अपना दाहिना हाथ फैलाकर भेंट स्वीकार कर रहे थे। एक वृद्ध महिला आधा फल लेकर आई और बोली, 'भगवन, मेरे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं हैं। मैं तो बहुत गरीब हूं। मुझे जब मालूम पड़ा कि आप भेंट स्वीकार करने वाले हैं, तब तक मैं आधा फल खा चुकी थी। बस आधा बचा है। वह आपको देना चाहती हूं।' बुद्ध यह सुनते ही आसन से उतरे और उन्होंने अपने दोनों हाथ फैलाकर बुढि़या का आधा फल स्वीकार किया। यह देखकर वहां उपस्थित लोग आश्चर्य में पड़ गए। बिम्बसार ने इसका कारण पूछा तो बुद्ध ने शांत भाव से उत्तर दिया, 'आप सब ने अपनी बहुमूल्य संपत्ति का एक अंश मात्र दान में दिया है। उसमें दान देने का अहंकार भी शामिल है। पर इस वृद्धा ने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया, किंतु इसके मुख पर कितनी करुणा तथा नम्रता है।' बुद्ध की इस बात पर सबका सिर झुक गया।
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वैयाकरण कैयट दिन में आजीविका के लिए परिश्रम करते और रात में महाभाष्य पर टीका लिखा करते थे। कार्य के बोझ का असर उनके स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा था। एक दिन उनकी पत्नी ने उनसे इतना परिश्रम न करने की प्रार्थना की। इस पर कैयट बोले, 'मेरे पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है। परिवार का मुखिया होने के नाते मुझे धनोपार्जन का कार्य करना होगा और एक वैयाकरण होने के नाते मुझे ज्ञान के प्रसार का दायित्व भी निभाना होगा।' इस पर पत्नी ने कहा, 'आप गृह कार्य से मुक्त हो जाएं। मैं अब कुशा की राखियां बनाकर बेचूंगी। आप निश्चिंत होकर टीका लिखिए।' कैयट की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, 'जिसकी तुम्हारी जैसी जीवन संगिनी हो उसकी साधना अवश्य सफल होगी।'

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  1. 1 comments: Responses to “ सच्चा दान ”

  2. By Udan Tashtari on Friday, November 02, 2007 5:14:00 AM

    अच्छा लगा पढ़कर.

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