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भारतीय सेक्सुअलिटी : लड़कियों की एज ऑफ कंसेंट

Written by मुकेश कुमार on Wednesday, March 12, 2008

जब से लॉ कमिशन ने सरकार को लड़कियों की एज ऑफ कंसेंट (सहवास की सहमति देने लायक उम्र) पंद्रह से बढ़ाकर सोलह करने का सुझाव दिया है, भारतीय सेक्सुअलिटी के विविध आयामों पर पिछले पचास साल से चल रही बहस एक नई मंजिल पर पहुंच गई है। अगर सेक्स पर पड़े सारे रहस्यों का पर्दाफाश करते हुए उसके साथ जुड़ी रोमानी खामख्याली को नजरअंदाज कर दिया जाए, तो यह बात आईने की तरह साफ हो जाती है कि विवाह की संस्था के तहत अधिकतर स्त्रियां अपने पहले सहवास के साथी के रूप में एक अपरिचित पुरुष को स्वीकार करने को मजबूर होती हैं। हमारा समाज आम तौर पर अजनबियों के बीच होने वाली पहली यौन क्रिया के आधार पर ही चल रहा है। जाहिर है, सेक्स और स्त्नी के इस समीकरण में स्त्नी ही सबसे ज्यादा जोखिम का सामना करती है। इसलिए हमारे समाज के लिए खास तौर से जरूरी हो जाता है कि वह स्त्नी की एज ऑफ कंसेंट पर संजीदगी से गौर करे। पचास साल पहले बने कानून के आधार पर हमारा सामाजिक और पारिवारिक सफर काफी हो चुका। वह कानून उपयोगी था, लेकिन अब इन बातों पर नए फैसलों की जरूरत है। ऐसे फैसलों की, जो बदली हुई हकीकतों पर खरे उतर सकें।
आखिर ये बदली हुई हकीकतें क्या हैं? बदलते हुए यथार्थ का एक अहम पहलू यह है कि पिछले पच्चीस-तीस बरसों में भारतीय परिवार की संस्था की सदियों पुरानी जमीन खिसकने लगी है। सत्तर के दशक तक सेक्स का वैध केंद्र एक ही था- मध्यवर्गीय पति-पत्नी का शयनकक्ष। सेक्स का अवैध केंद्र था चकलाघर। यानी तब सेक्स के वैध और अवैध दायरे सुपरिभाषित होने के बावजूद संकीर्ण थे। आज परिवार की संस्था के भीतर हो रहे छोटे-छोटे सामाजिक धमाकों ने तलाक का प्रतिशत कई गुना कर दिया है, जिससे विवाह अब सात जन्मों का बंधन न रहकर इसी जन्म में निबट जाने वाला रिश्ता बन गया है। एक व्यक्ति के लिए (चाहे स्त्नी हो या पुरुष) कानूनी तौर पर मोनोगमी का पालन करते हुए एक के बाद एक कई रिश्तों की संभावनाएं खुल गई हैं। लिव-इन रिलेशनशिप उभर कर सामने आए हैं। इन परिघटनाओं ने परिवार की संस्था का दैवी आधार हिला दिया है। सेक्सुअलिटी के इतिहासकारों का यह कहना गलत नहीं है कि जैसे ही किसी समाज में परिवार की संस्था अस्थिर होती है, वैसे ही वहां पथभ्रष्ट समझी जाने वाली यौनिकताएं तेजी से अपनी दावेदारियों के साथ सामने आती हैं। उन समाजों में समलैंगिकताएं, आत्मरति के विभिन्न उपाय और यौन संतुष्टि का पूरा कारोबार सेक्सुअलिटी के स्थापित पारिवारिक रूपों को चुनौती देने लगता है।
खास बात यह है कि ये सारे बदलाव एक ऐसे समय में हो रहे हैं जिसमें विचारधाराओं के खंडहर चारों तरफ बिखरे हैं। चाहे वह राष्ट्रवाद हो, सेकुलरवाद हो, मार्क्सवाद हो या प्राचीन भारत की शान बधारने वाली परंपरा हो, ये सभी विचार पहले की तरह प्रामाणिकता के स्त्रोत नहीं रह गए हैं। जिंदगी को मायने देने वाली प्रामाणिकता की भरपाई करने के लिए जो शै उभर कर आई है, वह सेक्स है। बाजार ने इसमें जबरदस्त योगदान किया है। शॉपिंग और डेटिंग एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं। ऐसे सेक्सी समय में अगर एज ऑफ कंसेंट गड़बड़ रही, तो समाज का कबाड़ा होना तय है।
लेकिन ऐसे विकट समय के लिए एज ऑफ कंसेंट तय करना इतना आसान भी नहीं। इसे बढ़ाने के तर्क जोरदार लगते हैं और घटाने की दलीलें भी। मसलन, उम्र घटाने के पैरोकार मानते हैं कि यह उम्र जितनी ज्यादा रखी जाएगी, यौन शिक्षा देने में उतनी ही दिक्कत आएगी। कमसिन युवक-युवतियों के लिए सेक्स एक्ट का अपराधीकरण उन्हें अपनी कामनाएं और उनसे जुड़े सवाल छिपाने की तरफ ले जाएगा। इससे एड्स और अन्य यौन बीमारियों के चंगुल में फंसने का खतरा बढ़ेगा। दूसरी तरफ उम्र बढ़ाने के पैरोकारों की मान्यता है कि हमारा समाज आधुनिक है, आदिम नहीं। यहां स्त्री प्रजनन के स्त्रोत के तौर पर नहीं देखी जा सकती। शारीरिक विकास से भी ज्यादा जरूरी है उसका मानसिक विकास होना। दूसरे, नई अर्थव्यवस्था में वह उत्पादक श्रम का बहुत बड़ा स्त्रोत है। अगर वह वयस्क और परिपक्व होने से पहले ही बच्चा जनने में फंस गई तो समाज अपनी आधी आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से की रचनात्मक प्रतिभा से वंचित रह सकता है। एक तीसरा तर्क भी है, जो विशुद्ध तकनीकी किस्म का है। इसका कहना है कि अन्य संबंधित कानूनों और एज ऑफ कंसेंट कानून के बीच मौजूदा विसंगतियों को खत्म करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। इसके अलावा कुछ लोगों को इस कानून की समीक्षा इसलिए भी जरूरी प्रतीत हो रही है कि इससे मनुष्य के बचपन की चौहद्दी नए सिरे से तय की जा सकती है। सहवास की सहमति देने लायक हो जाने पर व्यक्ति को तकनीकी रूप से बच्चा तो नहीं ही माना जा सकता। बाल यौन शोषण या बाल श्रम की परिभाषा भी इससे बदल जाएगी।
आजाद भारत में इस विषय पर बहस का पहला दौर पचास के दशक में चला था। तब देश के पहले कानून मंत्नी डॉ. आम्बेडकर ने हिंदू कोड बिल पेश किया था। उस समय हिंदू समाज की सभी अनुदारतावादी ताकतें एकजुट होकर एज ऑफ कंसेंट बिल के खिलाफ खड़ी हो गई थीं। चूंकि हिंदू समाज की आधुनिकता का भविष्य काफी कुछ इस कानून के पास होने पर निर्भर था, इसलिए हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने झुकने से इनकार करते हुए कानून बनाकर ही दम लिया। लेकिन आज लॉ कमिशन के इस सुझाव पर चल रही बहस का लहजा तल्ख होने के बजाय संतुलित और सकारात्मक है। दोनों बहसों के चरित्न का यह फर्क बताता है कि समाज कितना बदल चुका है। आज की चर्चा में न तो नैतिकता के ठेकेदारों की आवाज सुनाई पड़ रही है, और न ही धर्म व परंपरा की दुहाई दी जा रही है। विशेषज्ञों की भूमिका अधिक है। सेक्स और समाज का रिश्ता सेक्सुअलिटी की दुनियावी कसौटियों पर कसा जा रहा है। इसलिए हम उम्मीद कर सकते हैं कि एज ऑफ कंसेंट की दुविधा दूर करते हुए जो नया कानून बनेगा उसका सूत्नीकरण बिना किसी दबाव के सूझबूझ के साथ हमारे सामाजिक विकास के नए चरण के मुताबिक किया जाएगा।

जीतने की कला

Written by मुकेश कुमार on Tuesday, November 20, 2007

रामायण का एक मशहूर पात्र था बाली..वानर वंश के इस प्रतापी राजा की खूबी थी कि जब कभी इसका कोई प्रतिद्वंद्वी सामने आकर उसे युद्ध के लिए ललकारता था...तो बाली पलक झपकते दुश्मन पर टूट पड़ता था...और, बाली कभी हारता नहीं था...आखिर ऐसा क्या था बाली में जिसने उसे अविजित बना रखा था..यह राज बाली के छोटे भाई और उसके प्रबल दुश्मन सुग्रीव ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के सामने तब खोला जब श्रीराम सुग्रीव की तरफ से बाली का संहार करने गये थे..सुग्रीव ने श्रीराम को सलाह दी कि किसी भी हालत में बाली के सामने आकर उस पर वार मत कीजिएगा...क्योंकि, बाली को वरदान है कि जो कोई भी दुश्मन उसके सामने आएगा..उसकी आधी ताकत बाली को अंदर आ जाएगी..श्रीराम ने इस सलाह पर अमल करते हुए एक पेड़ के पीछे छुपकर बाली पर तीर चलाये...और बाली मारा गया..हांलाकि, छुप कर दुश्मन की हत्या करने का पाप भी श्रीराम पर चढा और उन्हे खासी आलोचना का शिकार भी बनना पड़ा..बहरहाल, हम यहां उस भेद पर चर्चा करने की कोशिश करेंगे कि कैसे बाली अपने दुश्मन से आधी ताकत खींच लेता था...मेरा मानना है कि इस ताकत के पीछे बाली का वह एटीच्यूड या मनोभाव जिम्मेदार था जिसे बाली ने खासी साधना के बल पर अर्जित किया था...अमूमन हम जब किसी प्रतिस्पर्धी या दुश्मन के सामने पड़ते ही गुस्से या नफरत की उमड़ती प्रचंड लहरों के सैलाब में बह जाते हैं..हमारा दिमाग उस वक्त वर्तमान से अधिक अतीत के उन पन्नों को खंगालने लगता है जिसमें उस प्रतिस्पर्धी ने तमाम तरह से हमारा नुकसान करने की कोशिश की...अतीत की यादें हमारे जहन को इतना जहरीला कर देती हैं कि हम अपना आपा खोकर दुश्मन पर टूट पड़ते हैं..होश खोकर किया गुस्सा अक्सरहां हमारे सोचने की शक्ति छीन लेता है और अमूमन हमारे दांव इतने कमजोर पड़ जाते हैं कि हम अपने से कमजोर दुश्मन से भी या तो हार जाते हैं या उससे भय खाने लगते हैं...अब इसकी जगह यदि हम अपनी रणनीति बदल लें... यानी अतीत को भूलकर सिर्फ वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करें तो... जाहिर है कि हम गुस्से की उस प्रचंड धारा में बहने से बच जाएंगे जो उस वक्त हमारा होश छीन लेती है...अब इसके साथ ही यदि हम यह सोचें कि सामने वाला प्रतिस्पर्धी वस्तुत:हमारा शुभचिंतक है जो हमारी शारीरिक और मानसिक ताकत की परीक्षा लेने आया है..ताकि वक्त के साथ हम और मजबूत होकर उभड़ें...तो ऐसी सोच का क्या असर होगा...दुश्मन पर इसका प्रत्यक्ष असर पड़े या नहीं...हम पर तो निश्चित रूप से प्रभाव पड़ेगा...प्रबल दुश्मन के सामने भी हमारी सोच भावना के सैलाब में नहीं बहेगी..हम उस वक्त ठंडे दिमाग से अपना फैसला ले पाएंगे...दुश्मन की कमजोरी को सही ढंग से भांप पाएंगे...और उसे पराजित करने का अचूक फार्म्यूला उपाय में ला पाएंगे..जाहिर है कि इसके नतीजे भी हमें सकारात्मक ही मिलेंगे..अगर हमने होश बना रखा है और दुश्मन होश खो चुका है तो इसका फायदा किसे मिलना है क्या यह भी बताने की बात है..

अपने ब्लोग मे रिसेन्ट पोस्ट का विडगेट जोडना Blogger Recent Posts widget

Written by मुकेश कुमार on Tuesday, November 06, 2007

क्या आप अपने स्लाइडबार मे रिसेट विलेट को लगाना पसन्द करते हो?
आप इन स्टेप का फोलो करे -
1. पहले आप kaalchakraa के स्थान पर अपने ब्लोग का नाम लिखे.
2. अब आप रिसेन्ट पोस्ट के नम्बर को सेट करे (अभी 10 सेट है.आप 25 तक बडा सकते है)
3. यदी आप पोस्ट दिनांक को दिखाना चाहते हो उसे चेक करे ( अभी चेक है)
4. यदी आप पोस्ट समरी को दिखाने चाहते हो तो उसे चेक करे ( अभी चेक है)
5. आप पोस्ट समरी मे कितने शब्द दिखाना चाहते है वो सख्या भरे ( अभी 100 सेट है)
6.अब आप Styling मे standard को चुने
7. Sorting मे published को चुने

नोट-सबसे पहले ऊपर दिये हुए निर्देश का पालन कर Costomize बटन पर क्लिक करके Add Widget To My Blog पर क्लिक कर अपने ब्लोग मे जोडे .आप अगर कोई परेशानी हो तो अपने सुझाव बताये
उदाहरण के लिए इसे मेने अपने ब्लोग के स्लाइडबार लगाया है जहा Recent Posts लिखा हुआ है

Instructions

Change settings
Click 'Customize' button
Click 'Add Widget To My Blog' button
If you select "custom css" add the following classes to your template: .bbrecpost, .bbrecpostsum and .bbwidgetfooter


Widget Title

Widget Title:


Customize Widget

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Styling: standard custom ccs
Sorting: publishedupdated



    








मैडम बैथोरी इतिहास की क्रूरतम महिला

Written by मुकेश कुमार on Saturday, November 03, 2007

7 अगस्त 1560 को हंगरी में एक ऐसी महिला ने जन्म लिया, जिसे अगर अब तक की क्रूरतम महिला कहा जाय तो शायद कोई अतिश्योक्ति न होगी। यह वह महिला थी, जिसने सैकड़ों लड़कियों को ऐसी भयानक व क्रूर मौत दी कि आज भी सुनने वाले यह विश्वास नहीं कर पाते कि कैसे कोई महिला क्रूरता की हर सीमा लांघ सकती है? इस महिला का नाम था काउंटेस बैथोरी, जिसे खूनी कांउटेस एलिजाबेथ बैथोरी भी कहा जाता है।एलिजाबेथ के परिवार में काफी सदस्य टोने-टोटके, चुड़ैलों में तो विश्वास रखते ही थे। कई समलिगी और लम्पट होने के साथ कामभावना से भी ग्रसित रहते थे। हद तो उस समय हो गयी, जब कामान्ध एलिजाबेथ ने मात्र 14 वर्ष की अल्पआयु मेें किसान के एक गरीब लड़के से संबंध बनाये और गर्भवती हो गयी। यह वह समय था, जब वह होने वाली सास उर्सुला नेडेस्डी के किले में रह रही थी क्योंकि जब वह मात्र 11 वर्ष की थी तो उसकी सगाई काउंटेस उर्सुला के पुत्र काउंट फ्रेज नेडेस्टी से कर दी गयी। उन दिनों कम उम्र में ही सगाई व शादी हो जाना आम बात थी व रईस लोग अपने बच्चों की शादी आ॓हदे पर जमे लोगों के परिवार में कर राजनीतिक या धन का लाभ कमाते थे।8 मई 1575 को एलिजाबेथ व फ्रेंज का विवाह हो गया। शादी के समय वह मात्र 15 वर्ष की थी। शादी के बाद भी एलिजाबेथ ने अपना पारिवारिक नाम नहीं छोड़ा और बैथोरी ही नाम के साथ जोड़े रही। यह जरूर हुआ कि उसके पति ने अपने परिवार का नाम त्याग स्वयं को फ्रेंज बैथोरी कहलाना शुरू कर दिया। फ्रेंज को पारिवारिक जीवन से कहीं ज्यादा पसंद था, उसने युद्ध में बहाये खून की वजह से नाम पाया था- ‘ब्लैक हीरो ऑफ हंगरी’। उधर बैथोरी समय बिताने के लिए अपनी समलिगी रिश्तेदार क्लारा बैथोरी के यहां जाने लगी, यहां के बंद कमरों में सेक्स का घिनौना खेल खेला जाने लगा।किले के एक नौकर को काले जादू में महारत हासिल थी। इस नौकर का नाम था थोरको व बैथोरी इसीसे काला जादू सीखने लगी। अपने एक पत्र में एलिजाबेथ ने फ्रेंज को लिखा कि उसने थोरको से सीखा है कि पहले एक काली मुर्गी को छड़ी से पीट-पीटकर मार दो फिर इस मुर्गी का खून अपने दुश्मन पर छिड़क दो। अगर दुश्मन पर न छिड़क पाआ॓ तो उसके कपड़ों पर ही छिड़क दो दुश्मन का काम तमाम हो जाएगा। बैथोरी के इस काले जादू में थोरको के अलावा एक नौकरानी डलोना जू व दो चुड़ैले डोरोथ्या जेनटेस व डारवूूलिया भी सहयोगी थी। इन सभी के साथ एक बौना जोहानस यूजवेरी भी था। उन दिनों रईसों व सम्राटों के यहां बौने पले होते थे। यूजवेरी जैसा क्रूर बौना शायद ही कभी हुआ हो। जल्द ही वह लड़कियों को यातनाएं देने का मुखिया बन गया व अगर कोई नौकरानी जरा सी भी गलती करती तो उसे भयंकर यातनाएं दी जाती।बैथोरी ने यातनागृह भी बनवा रखा था। यहां लड़कियों को लोहे की गर्म सलाखों से दागा जाता। उन पर गर्म मोम डाली जाती और चाकुओं से उनके शरीर को काटा जाता। बैथोरी ने एक नग्न युवती के शरीर पर शहद लगा, उसे लाल चीटियों के बीच छोड़ दिया था। बैथोरी कैद की गयी लड़कियों, जिन्हें नौकरी के लालच में किले में बुलवाया जाता था, को दांतों से काटती व दांतों से काटकर उनका गोश्त नोच लेती। लड़कियों को आग से जलाया जाता, चाकुओं से शरीर काटा जाता और चांदी की चिमटियों व सूजे से मांस को नोंचा व छेदा जाता। ऐसा कहा जाता है कि बैथोरी सुंदर थी। उसके बाल लंबे व काले, आंखें भूरी व त्वचा का रंग एकदम गोरा था। शरीर थोड़ा भरा हुआ था, इतना आकर्षक कि अगर किसी का ध्यान उस पर चला जाय तो नजरें हटती ही नहीं थी। वह अपने रूप सौन्दर्य पर इस कदर मोहित थी कि उम्र बढ़ने पर वह अपनी र्झुिरयों से परेशान रहने लगी। हर जवान लड़की से उसे नफरत हो गयी।एक दिन जब बैथोरी ने अपनी नौकरानी को झापड़ मारा तो नौकरानी की नाक से खून निकला व खून की कुछ बूंदे बैथोरी के चेहरे पर आ गिरी। जब बैथोरी ने अपने चेहरे को दर्पण में देखा तो उसे लगा जैसे खून के लगते ही उसके चेहरे की र्झुिरयां गायब हो गयी। इसी के बाद बैथोरी ने मासूम लड़कियों पर जो अत्याचार किये वे इतिहास के सबसे यातनामयी अध्याय है। बैथोरी किसी भी तरह जवान रहना चाहती थी, इसके लिए उसे चाहिए था तमाम कुंवारी लड़कियों का खून। वह ऐसी लड़कियों को मरवा देती और उसके रक्त से नहाती। 1604 में उसके पति फ्रेंज का देहान्त या तो जहर दिये जाने से या फिर टोने-टोटके हो गया पर बैथोरी ने हत्याएं कम नहीं की।डारवूलिया (सहयोगी) के देहान्त के बाद बैथोरी को सलाह दी गयी कि क्वारी कन्याएं संभ्रान्त परिवार की हो तो उनका रक्त ज्यादा असर करेगा। दस साल तक बैथोरी लड़कियों के रक्त से नहाती रही व 650 लड़कियां बेमौत मारी गयी। हद तो यह है कि 610 लड़कियों का हर ब्योरा बैथोरी की डायरी में स्वयं उसने दर्ज किया। वह तंत्र मंत्र व टोने-टोटके में भी लगी रही। कुछ की गर्दनें काट दी गयी व कुछ की उंगलियां नोंचकर अल्जल्द ही सारे शहर में उसके कारनामों की खबर फैल गयी। सभी के मन में बैथोरी के प्रति नफरत फैल गयी। सरकार ने उस पर व उसके साथियों पर मुकदमा चलाया। बैथोरी स्वयं मुकदमे में नहीं आयी । उसके साथियों पर पिशाच व चुड़ैल होने के साथ तंत्र-मंत्र करने का मुकदमा चला गया बाद उन्हें जिदा जला दिया गया।बैथोरी को पागल करार कर ऐसी कोठरी में डाल दिया गया जिसमें न खिड़की थी, न दरवाजा। बस एक दीवार के नीचे खाना देने के लिए आयताकार छिद्र बना था। बैथोरी जमीन पर लेटकर इसीसे बाहर झांका करती व कई साल नर्क सा जीवन जीने के बाद 14 अगस्त 1614 को इस क्रूरतम महिला की मृत्यु हुई।

सच्चा दान

Written by मुकेश कुमार on Friday, November 02, 2007

बुद्ध ने मगध की राजधानी में उपदेश देने के बाद लौटने का निश्चय किया तो अनेक उपासक उन्हें भेंट देने आए। बुद्ध एक पेड़ के नीचे हर किसी का उपहार स्वीकार कर रहे थे। सम्राट बिम्बसार ने अनेक बहुमूल्य वस्तुएं प्रदान कीं। सेठ-साहूकार भी कीमती चीजें लेकर आए थे। बुद्ध अपना दाहिना हाथ फैलाकर भेंट स्वीकार कर रहे थे। एक वृद्ध महिला आधा फल लेकर आई और बोली, 'भगवन, मेरे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं हैं। मैं तो बहुत गरीब हूं। मुझे जब मालूम पड़ा कि आप भेंट स्वीकार करने वाले हैं, तब तक मैं आधा फल खा चुकी थी। बस आधा बचा है। वह आपको देना चाहती हूं।' बुद्ध यह सुनते ही आसन से उतरे और उन्होंने अपने दोनों हाथ फैलाकर बुढि़या का आधा फल स्वीकार किया। यह देखकर वहां उपस्थित लोग आश्चर्य में पड़ गए। बिम्बसार ने इसका कारण पूछा तो बुद्ध ने शांत भाव से उत्तर दिया, 'आप सब ने अपनी बहुमूल्य संपत्ति का एक अंश मात्र दान में दिया है। उसमें दान देने का अहंकार भी शामिल है। पर इस वृद्धा ने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया, किंतु इसके मुख पर कितनी करुणा तथा नम्रता है।' बुद्ध की इस बात पर सबका सिर झुक गया।
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वैयाकरण कैयट दिन में आजीविका के लिए परिश्रम करते और रात में महाभाष्य पर टीका लिखा करते थे। कार्य के बोझ का असर उनके स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा था। एक दिन उनकी पत्नी ने उनसे इतना परिश्रम न करने की प्रार्थना की। इस पर कैयट बोले, 'मेरे पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है। परिवार का मुखिया होने के नाते मुझे धनोपार्जन का कार्य करना होगा और एक वैयाकरण होने के नाते मुझे ज्ञान के प्रसार का दायित्व भी निभाना होगा।' इस पर पत्नी ने कहा, 'आप गृह कार्य से मुक्त हो जाएं। मैं अब कुशा की राखियां बनाकर बेचूंगी। आप निश्चिंत होकर टीका लिखिए।' कैयट की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, 'जिसकी तुम्हारी जैसी जीवन संगिनी हो उसकी साधना अवश्य सफल होगी।'

मोदी मा बड़ी आग है !

Written by मुकेश कुमार on Thursday, November 01, 2007

जब कभी वह आग उगलते हैं तो नॉर्मल लगते हैं। चुनाव लड़ने से पहले उन्हें अपनी पार्टी के भीतर विरोधियों से लड़ना पड़ेगा। अगर किसी के पास माचिस न हो और उसे बीड़ी जलानी हो तो कम से कम भारत में चिन्ता की कोई बात नहीं, क्योंकि यहां दो आइटम ऐसे हैं जिनसे इस स्थिति में काम चलाया जा सकता है। उनमें से एक तो आप जानते ही हैं- आदरणीय बिपाशा बसु। और दूसरे श्रद्घेय महानुभाव हैं नरेन्द्र मोदी। बिपाशा के तो सिर्फ जिगर में ही आग है, जिससे सिर्फ बीड़ी ही जलाई जा सकती है, लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री और बीजेपी के अग्निपुरुष नरेन्द्र मोदी के दिल, दिमाग, जिगर, गुर्दा, हाथ, पांव यानी सारी बॉडी में आग ही आग है। बीजेपी को देश भर में कहीं भी होने वाले चुनावों की आग जब प्रज्ज्वलित करनी होती है, तब वहां नरेन्द्र मोदी को सादर आमंत्रित किया जाता रहा है। भारतीय व्यंग्य साहित्य में नरेन्द्र मोदी का अभूतपूर्व योगदान है। वह जब भी हिन्दुत्व को ऊंचा उठाने की कोशिश में अपने मौलिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं तो पता नहीं हिन्दुत्व ऊंचा उठता है या नहीं, पर तब देश भर के व्यंग्यकारों की कलम को स्याही जरूर मिल जाती है। देश के विभिन्न राज्यों में राज्य स्तर के विभिन्न हिन्दू हृदय सम्राट हैं, लेकिन मोदी जी राष्ट्रीय स्तर के हिन्दूहृदय सम्राट हैं। देश के अन्य हिन्दू हृदय सम्राट हिन्दुत्व के ब्रांड के प्रतिनिधि हैं, पर मोदी जी हिन्दुत्व के ब्रांड एम्बेसेडर हैं। पता नहीं प्रेम, दया, करुणा, शांति भरे देश के हिन्दुओं और हिन्दू धर्म के हृदय को वह कितना जानते-समझते हैं। दरअसल इसके लिए एक ठोस हृदय होना भी जरूरी है। जब कभी वह आग उगलते हैं, नॉर्मल लगते हैं। पर मुम्बई की ट्रेनों में हुए विस्फोटों के बाद जब मुम्बई में वह कहते हैं कि 'बम विस्फोट में जो मारे गए जो घायल हुए वे सारे मेरे भाई हैं, फिर उनकी जाति, धर्म चाहे जो हो', 'तब लगता है मोदी जी की तबीयत कुछ नासाज है।' मोदी जी इतने बिजी रहते हैं कि ट्वेंटी20 की ऐतिहासिक विजय के बाद अन्य राज्यों के खिलाड़ियों को उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा सम्मानित करने के काफी दिनों बाद मोदी जी को इरफान और यूसुफ पठान को सम्मानित करने की याद आई थी। नरेन्द्र मोदी नेता हैं, कवि और अभिनेता भी। वह 'विक्रम-बेताल' का अक्सर मंचन करते रहते हैं। अब लोगों को और खास तौर पर इन मुए पत्रकारों को क्या कहें, इतने बरस बीत जाने के बाद भी बंदों ने गोधरा की आग की खबरों में जगाए ही रखा है। दरअसल गोधरा- कांड बेताल बनकर बार- बार राजा विक्रम यानी मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के सिर पर सवार होता रहता है। मगर कभी-कभी जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के अल्पसंख्यकों पर सवार होने की कोशिश करते हैं, तब लगता है विक्रम बेताल की भूमिका में आ चुका है। बीजेपी और नरेन्द्र मोदी अपनी मौलिक और अद्वितीय सोच के लिए देश भर में विख्यात हैं। सरदार वल्लभभाई पटेल के जीवनकाल में उन्होंने कभी बीजेपी या आरएसएस की ओर देखा तक न हो, पर पिछले कुछ सालों से सरदार पटेल के प्रति बीजेपी वालों को, खासकर नरेन्द्र मोदी का इतना प्रेम उमड़ा है कि उन्होंने अपने पार्टी स्तर पर लालकृष्ण आडवाणी को आधुनिक सरदार पटेल घोषित करते हुए पटेल के तमाम मार्ग के अनुसरणकर्ता वाहक के रूप में नरेंद्र मोदी नामक जाज्ज्वल्यमान सितारे को प्रस्तुत किया है। नरेन्द्र मोदी का पटेल- प्रेम बस इतना ही है। गुजरात के अन्य पटेलों के प्रति वह उतने ही आक्रामक होते हैं जितने वह पाकिस्तान के प्रति होते हैं। इन पटेलों में प्रमुख नाम केशुभाई पटेल का है। अब गुजरात विधानसभा का चुनाव सामने है। दो बार मोदी चुनाव जीत चुके हैं, पर तीसरी बार केशु भाई ही नहीं, कांशीराम राणा, सुरेश मेहता, वल्लभभाई कथीरिया और आदि दिग्गजों से भी चुनाव के पहले मोदी ही को लड़ना पड़ सकता है। ऐसे में उनकी हिन्दुत्व की तलवार भी लम्बे समय से जंग लगी हुई हालत में हैं। पिछले दिनों मोदी जी मुम्बई पधारे। वहां मुम्बई के कुछ गुजरातियों को, कुछ पत्रकारों और बीजेपी वालों ने मिलकर सम्पूर्ण मुम्बई के गुजरातियों का प्रतिनिधि घोषित कर दिया। सभा में श्रोताओं में से मोदी जी के भाषण के दौरान घोषणा गूंजी- 'नरेन्द्र मोदी आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं।' तभी अपने भव्य- दिव्य और गदगदाए स्वर में मोदी जी ने जनता से कहा: 'भई, मेरे साथ मत आओ, मेरा रास्ता कांटों भरा है।' कहीं मोदी जी का यह वाक्य अगले विधानसभा चुनाव में गुजरात की जनता ने सुन लिया तो अगला पथ मोदी जी के लिए वाकई कांटों भरा हो सकता है। ' वे आए, देखा और छा गए' -यह मुहावरा अब शायद नरेन्द्र मोदी जी के लिए पुराना पड़ चुका है। पहले भले ही उनकी सभाओं में ऐसा होता हो, पर पिछले दिनों एक टीवी चैनल के लाइव टेलिकास्ट में दो चार सवालों के बाद ही इस वीर पुरुष की सिट्टी- पिट्टी गुम हो गई और शो अधूरा छोड़कर 'शो मस्ट गो ऑन' के नियम को गलत साबित करते हुए शो मैन ही शो से गायब हो गया।
सोजन्य - नवभारत टाइम्स

लियोनार्दो दा विंची की मशहूर कलाकृति " द लास्ट सपर "

Written by मुकेश कुमार on Sunday, October 28, 2007

द लास्ट सपर


जाने माने रोमन चित्रकार लियोनार्दो दा विंची की मशहूर कलाकृति द लास्ट सपर की बेहद स्पष्ट तस्वीर अब इंटरनेट पर भी देखी जा सकती है.
स्पष्ट इसलिए क्योंकि इस चित्र की प्रति बनाई गई है अरबों पिक्सल के एक कैमरे से.
इंटरनेट पर जारी 16 अरब पिक्सल की ये तस्वीर पहले की तुलना में बिल्कुल साफ नज़र आती है. यानि अब ये पूर्व के एक करोड़ पिक्सल के डिजिटल कैमरा से खींची गई तस्वीर से 1600 गुना ज़्यादा स्पष्ट है.
15वीं सदी में बनी इस तस्वीर को इंटरनेट के जरिए देखने के वास्ते कई तकनीकी सुविधाएं भी मुहैया कराई गई हैं. जैसे तस्वीर के जिस हिस्से को प्रमुखता से देखना हो उसे चुनकर बड़ा या छोटा करके स्पष्ट देखा जा सकता है.
इसके साथ साथ इसके हर हिस्से के बारे में सूक्ष्म जानकारी भी उबलब्ध है.
ऐतिहासिक कलाकृति
वास्तविक रूप में ये कलाकृति इटली के मिलान शहर के सांता मारिया डेले ग्रेजी चर्च में रखी है.इसे इंटरनेट पर जारी करने के पीछे प्रदूषण से इसे होने वाला लगातार नुकसान बताया गया है.
आर्ट क्यूरेटर एल्बर्टो अर्तियोली ने एपी को बताया कि इंटरनेट पर आप इस तस्वीर के हर हिस्से को जूम यानि बड़ा करके निहार सकते हैं जबकि वास्तविक तस्वीर में यह बेहद मुश्किल होता है.
इसे http://www.haltadefinizione.com पर देखा जा सकता है.
अर्तियोली ने कहा 'आप देख सकते हैं कि लियोनार्डो ने इस तस्वीर में मौजूद कप को किसप्रकार पारदर्शी बनाया है. जबकि वास्तविक तस्वीर में इसे देख पाना संभव नहीं होता. इसके साथ ही इस कलाकृति में हुए क्षय को भी महसूस किया जा सकता है.'
विंची की इस तस्वीर को लगातार हो रहा नुकसान हाल के दिनों में काफी चर्चा और चिंता का विषय रहा था.
इटली के एक अख़बार के अनुसार 1990 के दशक के आखिरी वर्षों में इस तस्वीर को संरक्षित करने का तरीका कारगर नहीं रहा, और दर्शकों के कारण भी इस तस्वीर को धूल और गंदगी से काफी नुकसान पहुंचा था.
द लास्ट सपर को लियोनार्डो द विंची ने 15वीं सदी के आखिरी वर्षों में बनाई थी. हर साल लगभग साढ़े तीन लाख लोग इस कलाकृति को देखने आते हैं. सोजन्य - BBC Hindi

सुबह-सुबह एक कप चाय का प्याला - जाने चाय पीने का इतिहास

Written by मुकेश कुमार on Sunday, October 28, 2007

एक कप चाय का प्यालाचाय जो भारत और चीन, विश्व के दो प्रमुख प्राचीन सभ्यता वाले देशों में सबसे लोकप्रिय पेय हैं। यह दोनों ही देश कई शताब्दियों से एक दूसरे के साथ कई सांस्कृति और आर्थिक आदानप्रदानों से जुड़े हुए है और इन आदानप्रदानों में चाय की भी एक खास स्थान है।
भारत और चीन के बीच मैत्रीपूर्ण आवाजाही करने का लगभग दो हजार सालों का इतिहास है । इसी लम्बे काल में हमारे दोनों देशों ने एक दूसरे से बहुत कुछ सीख पाये है । मिसाल के तौर पर ,बौद्ध धर्म भारत से चीन आया था । बौद्ध धर्म के साथ चीन ने भारत से संगीत , चित्र , चिकित्सा तथा बहुत सी चीज़ें सीखी थीं । भारत में भी कुछ चीनी सभ्यता का निशान दिखता है । सील्क और चाय ये दोनों ही चीज़ें चीन से भारत गयी थीं । यह सील्क व चाय दोनों शब्दों के उच्चारण से ही पता लगाया जा सकता है । चीनी भाषा में सील्क का उच्चारण सी , और चाय का उच्चारण चाय ही होता है ।
जब भी हम भारत और चीन में सभ्यता के बारे में बात करते है, तो हमारा ध्यान मेहमाननावाजगी की ओर जाता है क्योंकि यह दोनों ही समाजों का अभिन्न अंग है। और जब भी इन दोनों देशों में हम मेहमाननवाजगी की बात करते है, तो एक विषय अपनी ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है।
दोनों देशों की संस्कृति में चाय की रोजमर्रा जिंदगी में एक प्रमुख स्थान है। एक दैनिक पेय और मेहमाननवाजगी का अभिन्न हिस्सा होने के अतिरिक्त चाय हमारे स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है।
चीन में ऐसा कथन है कि चाय पीने से न सिर्फ हमें उत्तेजित किया जा सकता है , बल्कि हमारे शरीर को बहुत से लाभ पहुंचाया जा सकता है । चाय पी कर हम अपनेआप को तन्दुरूस्थ बना सकते है । चीनियों ने प्राचीन काल से ही चाय पीना शुरू किया था । चीनी इतिहास में चाय को लेकर कई सारे दिलचस्प कहानीयाँ है। कुछ पुस्तकों के अनुसार प्राचीन काल में लगभग पांच हजार साल पहले चीन के महान राजा शेननूंग ने अपनी जनता को उपयोगी खाद्य पदार्थों की तलाश करने के लिए जंगल में सभी जड़ी बूटियों को मुंह में खाने का परीक्षण किया था । जब उन्हों ने चाय पेड़ के पत्तों को भी खाया था , तब उन्हें यह पता लगा कि चाय को उबाला गया पानी में डालकर पीने से दिमाग और शरीर दोनों के लिए लाभदायक होगा तभी से चीनियों ने चाय पीना शुरू किया था ।लेकिन चीन में चाय थांग काल से एक लोकप्रिय पेय बनीं।चाय के ऊपर पहली पुस्तक चाय ग्रेंथ में ल्यूयू द्वारा लिखि गई थी।इस में चाय के इतिहास,इसको बनाने के तरीके विस्तार से बताया गया है।कुछ का यह मनना है कि बौद्ध धर्म के पुजारी इस पुस्तक से प्रेरित हो कर जापानी चाय समारोह आरम्भ की।चाय शब्द का स्रोत भी चीनी भाषा की छाई और चाय।इसके बाद चाय चीन से दुनिया के कोने कोने पर फैल गया । पर मुझे मालूम नहीं कि चाय कब और कैसे भारत गया था ।
जहाँ तक भारत का सवाल है अट्ठारह सौ तीस की दशक, जब भारत में आर्थिक तौर पर चाय की उत्पादन आरम्भ की गयी,से पहले आसाम की जंगलों में चाय एक जंगली पेड़ के रूप में उगती थीं ।सन् पंद्रह सौ उन्नसठ में डच यात्री लिनस्कोटन एक किताब में बताए थे कि भारतीय एक खास किस्म की पत्तों को अद्रक और तेल के साथ मिला कर सब्जी के रूप में खाया करते थे ।सन् सत्रह सौ में एक ब्रिटिश जीववैज्ञानिक बैंक्स,ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को यह सुझाव दिया की भारत की उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र सभी तरीकों से चाय की उत्पादन के लिए अनुकूल है।लेकिन इस सुझाव की ओर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया। सन् अट्ठारह सौ तेइस और ब्रुस, और उनके अनुज चाल्स ने इस बात की पुष्टी की कि चाय असाम की जन्मतःनिवासी है।लेकिन सन्अट्ठारह सौ तैंतीस में आर्थिक तौर पर चाय का उत्पादन आरम्भ किया गया।
श्री चाल्स ब्रुस के नेतृत्व में एक कमिटी का घटन किया गया। इस योजना के अंतर्गत श्री ब्रुस को अस्सी हजार चाय के बीज लाने के लिए चीन भेजा गया।इन बीजों को कलकत्ता के एक नर्सरी में बोया गया।इस कमिटी के सदस्य इस बात से सहमत नहीं कर हुए की भारत में भी मूल रूप से चाय के पेड़ पाये जाते थे।इसलिए उन्होने यह निर्णय लिया की चाय के बीज चीन से मंगाया जाय।इस संदर्भ में यह भी कहा जाता है की ब्रुस ने दो चीनीयों को भारत बुलाया और चाय के पौधों को उगाने के रहस्यों की जानकारी लीं।असाम में भी चाय का उत्पादन आरंभ किया गया लेकिन हैरानी की बात यह है कि चीनी चाय यहा पर उग नहीं पाये।और यहा पर पहले से पाये गये चाय के पत्ते भारी मात्रा मí